UP Police: भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले सिपाही सुनील कुमार शुक्ला सेवा से बर्खास्त
लखनऊ कमिश्नरेट के सिपाही सुनील कुमार शुक्ला को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सेवा से बर्खास्त कर दिया। विभाग ने अनुशासनहीनता और सेवा नियमों के उल्लंघन का हवाला दिया, जबकि शुक्ला पहले विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप लगा चुके थे।
लखनऊ, विशेष संवाददाता | उत्तर प्रदेश पुलिस में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले पुलिस कांस्टेबल सुनील कुमार शुक्ला को आखिरकार सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। पिछले कई महीनों से सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के जरिए पुलिस विभाग के भीतर कथित भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और पुलिस लाइन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाले सुनील शुक्ला अब उत्तर प्रदेश पुलिस का हिस्सा नहीं रहे।
सुनील कुमार शुक्ला की बर्खास्तगी ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपने ही विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक रूप से उठाता है, तो उसकी सीमाएं क्या हैं और उसके अधिकार व दायित्व किस प्रकार संतुलित होने चाहिए।
भ्रष्टाचार के आरोपों से चर्चा में आए थे सुनील शुक्ला
लखनऊ कमिश्नरेट की रिजर्व पुलिस लाइन में तैनात रहे सिपाही सुनील कुमार शुक्ला ने कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर कई वीडियो जारी किए थे। इन वीडियो में उन्होंने आरोप लगाया था कि पुलिस लाइन में ड्यूटी लगाने की प्रक्रिया के दौरान कथित रूप से अवैध वसूली होती है और निचले स्तर के पुलिसकर्मियों से धन लिया जाता है। उन्होंने इन आरोपों की जांच मुख्यमंत्री स्तर से या न्यायिक जांच के माध्यम से कराए जाने की मांग भी की थी। वीडियो वायरल होने के बाद यह मामला प्रदेशभर में चर्चा का विषय बन गया था।
जांच के बाद हुए प्रशासनिक बदलाव
सूत्रों के अनुसार, सुनील शुक्ला द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद पुलिस लाइन की गणना ड्यूटी से जुड़े कुछ कर्मियों के कार्यस्थलों में प्रशासनिक फेरबदल किया गया था। हालांकि इन बदलावों को विभाग ने भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि के रूप में सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया।
अब सेवा से बर्खास्त
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा जारी आदेश के अनुसार सुनील कुमार शुक्ला को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है।
विभाग का कहना है कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों पर सार्वजनिक रूप से निराधार आरोप लगाए।
पहले निलंबन, अब बर्खास्तगी
सुनील कुमार शुक्ला पहले से निलंबित चल रहे थे। विभागीय जांच के बाद अब उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। इससे पहले उनके वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुए थे और उनके फेसबुक अकाउंट पर भी भारत में प्रतिबंध लगाए जाने की चर्चा सामने आई थी।
बड़ा सवाल
यह पूरा मामला कई महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ जाता है-
· क्या विभाग के भीतर भ्रष्टाचार की शिकायतों के लिए पर्याप्त और निष्पक्ष व्यवस्था मौजूद है?
· क्या सार्वजनिक मंच पर आरोप लगाने के बजाय संस्थागत शिकायत प्रणाली अधिक प्रभावी हो सकती है?
· क्या अनुशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है?
· क्या इस मामले में लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों पर स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है?
इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले समय में इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगे। इस रिपोर्ट में भ्रष्टाचार संबंधी दावे सुनील कुमार शुक्ला द्वारा सार्वजनिक रूप से लगाए गए आरोपों तथा उपलब्ध विभागीय प्रतिक्रिया पर आधारित हैं। इन आरोपों पर सक्षम न्यायिक अथवा वैधानिक प्राधिकरण द्वारा अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं किया गया है। विभाग ने कार्रवाई का आधार सेवा नियमों और अनुशासन के उल्लंघन को बताया है।
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